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रांची रिम्स: अब बोल व सुन सकेंगे मूक बधिर बच्चे

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रांची : राज्य के चार मूक बधिर बच्चे अब बोलने व सुनने लगेंगे. रिम्स के इएनटी ओटी में शुक्रवार को इन बच्चों में कॉक्लर इंप्लांट किया गया. देश के प्रसिद्ध कॉक्लर इंप्लांट विशेषज्ञ डॉ राजेश विश्वकर्मा की देखरेख में रिम्स के डॉक्टरों ने बच्चों में यह इंप्लांट लगाया. 

ऑपरेशन देर शाम तक चला. सभी बच्चों का ऑपरेशन सफल रहा. सबसे कम उम्र का बच्चा चतरा निवासी अभय साव (दो साल आठ माह) है, जिसे जन्म से ही सुनने व बोलने की समस्या है.  

इसके अलावा गिरिडीह निवासी सत्यम कुमार (दो साल 11 माह) व देवघर निवासी युवांश कुमार (तीन साल एक माह) का  भी कॉक्लर इंप्लांट किया गया. ये दोनों बच्चे भी जन्म से सुन व बोल नहीं पा रहे थे. 

वहीं संक्रमण की चपेट में आने से रांची निवासी संध्या  कुमारी (आठ साल) की सुनने की क्षमता चली गयी थी. उसका भी कॉक्लर इंप्लांट किया गया. अॉपरेशन के बाद चारों बच्चे स्वस्थ हैं. शीघ्र  ही इन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी जायेगी. रिम्स के इएनटी विभाग के डॉ पीके सिंह ने बताया कि शुक्रवार को चार बच्चों का कॉक्लर  इंप्लांट किया गया. शनिवार को अन्य चार बच्चों का कॉक्लर इंप्लांट किया जायेगा.   

ऑपरेशन टीम में ये थे शामिल : विभागाध्यक्ष डाॅ  पीके सिंह, डाॅ संदीप कुमार, डाॅ राजेश चौधरी, डाॅ जाहिद मुस्तफा खान, डाॅ निभा  निहारिका, डॉ रचना प्रसाद, डाॅ राजीव सक्सेना, डॉ नवदीप, डाॅ राजीव रोमल, डॉ निखिल, डॉ स्वेता, डॉ राहुल, डॉ इति, डॉ नइम, डॉ शालिनी, डॉ अनस व एनेस्थिसिया की विभागाध्यक्ष  डॉ शिवालिका, डॉ मुकेश आदि शामिल थे.  

इंप्लांट का पूरा खर्च सरकार वहन करती है   

क्या है कॉक्लर इंप्लांट 

कॉक्लर इंप्लांट को कृत्रिम कान भी कहा जाता है. यह कंप्यूटराइज्ड चिप होता है, जिसे रिसीवर स्टीम्युलेटर कहते हैं. इलेक्ट्रोड को मध्य कान के आगे कॉक्लिया के अंदर कान के सुननेवाली नस के साथ जोड़ दिया जाता है, जिसे स्पीच प्रोसेसर तक पहुंचाया जाता है. इसके बाद  मरीज में सुनने की क्षमता जागृत होती है. इंप्लांट का खर्च 5. 80 लाख रुपये आता  है. वहीं अन्य प्रक्रिया में 20 हजार रुपये खर्च होते हैं. इंप्लांट का पूरा खर्च सरकार वहन करती है.

टीबी से पीड़ित युवक के दिल की झिल्ली हो गयी थी मोटी, ऑपरेशन कर हटाया

रांची : रिम्स के कार्डियो थोरेसिक एंड वैस्कुलर सर्जरी (सीटीवीएस) विभाग के कार्डियेक सर्जन डॉ अंशुल कुमार की टीम ने कौसर अली के दिल का सफल ऑपरेशन किया है. टीबी मरीज होने के कारण कौसर के दिल की झिल्ली मोटी हो गयी थी. मेडिकल भाषा में इस बीमारी को क्रॉनिक कास्ट्रिक्टिव पेरिकार्डिटिक्स कहा जाता है. हार्ट की झिल्ली मोटी हो जाने के कारण हार्ट पर दबाव पड़ता था व  हृदय की गति कम हो जाती थी. 

इससे कौसर के शरीर में खून एकत्र हो गया था व छाती में पानी जमा हो गया था. मरीज को सांस लेने में दिक्कत हो रही थी. कार्डियेक सर्जन डॉ अंशुल कुमार ने बताया कि युवक की उम्र 18 साल है. इस कारण रैडिकल पेरिकार्डेक्टोमी (दिल को कवर करने वाली परतों को हटाना) सर्जरी की गयी. यह टीबी के मरीजों में आम बीमारी है. इसमें दवा से इलाज संभव नहीं होता है. सर्जरी ही अंतिम विकल्प है.  

ऑपरेशन करनेवाली टीम : विभागाध्यक्ष डॉ अंशुल कुमार व  एनेस्थिसिया के डॉ शियो प्रिया, डॉ नितेश, डॉ मुकेश, डॉ हर्ष, डॉ फुजैल  व असिस्टेंट  शमीम, विशाल व विजय के अलावा पीजी के प्रथम व द्वितीय वर्ष के  छात्र शामिल थे.



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