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ज्ञान के प्रकाशपुंज, उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत

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स्वा मी विवेकानंद का जन्म दिवस राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है, क्योंकि उन्हें युवाओं का आइकॉन माना जाता है. उन्होंने बुढ़ापा देखा ही नहीं, 39 वर्ष के उम्र में ही उनका निधन हो गया. उनकी जिंदगी और उनका धर्म, जीवन दर्शन पूरे विश्व के लोगों को, खास कर युवाओं को प्रेरित करता रहेगा.


 विवेकानंद के बारे में बहुत सारी बातें लोग जानते हैं और बहुत कुछ जानने के क्रम में कुछ भ्रांतियां भी फैली हुई हैं. स्वामी विवेकानंद पर अध्ययन के क्रम में जो मिथक और भ्रांतियां मेरे सामने आयीं, उन्हें इस लेख में मैंने स्पष्ट करने का प्रयास किया है.


 एक आम धारणा है कि विवेकानंद ने 1893 में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म महासभा में शून्य पर भाषण दिया था. विवेकानंद जब भाषण देने के लिए खड़े हुए तब उनके सामने दो पेड़ों के बीच में एक सफेद कपड़ा बंधा हुआ पाया, जिसके मध्य में एक ब्लैक डॉट था. वास्तव में ऐसा कुछ नहीं था. अमेरिकियों के लिए विवेकानंद नये थे. 


 ग्यारह सितंबर, 1893 को दस बजे प्रातः आर्ट पैलेस के मंच पर पूरे सम्मान के साथ अतिथियों को बैठाया गया. इनमे रोमन कैथ्लिक चर्च के प्रतिनिधि कार्डिनल गिबॉज, ब्रह्म समाज के मिस्टर मजूमदार, थीआसफी के चक्रवर्ती, तथा विश्व के अनेक धर्मों के प्रतिनिधि उपस्थित थे. उनमें विवेकानंद भी एक थे. विवेकानंद काफी नर्वस थे और इसलिए वे प्रातः के सत्र में नहीं बोले. सभी के पास लिखित व्याख्यान थे और विवेकानंद के पास कुछ नहीं था. 


द्वितीय सत्र में उन्हें पुनः बुलाया गया और वे मां सरस्वती और गुरुदेव को याद कर बोलने के लिए खड़ा हुए और पहले ही वाक्य 'सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका' ने सभागार में बैठे हुए सात हजार के करीब लोगों को खड़े होकर ताली बजाने के लिए बाध्य कर दिया. उनका यह संक्षिप्त भाषण हिंदू धर्म के शाश्वत स्वरूप को स्थापित करता था. उसके बाद उन्होंने जितने भी औपचारिक भाषण दिये उसका शीर्षक उसमें दिया हुआ है.


विवेकानंद शिकागो में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व करने गये थे.

विवेकानंद को हिंदू धर्माधिकारियों ने अथवा हिंदू धर्म के किसी भी पंथ ने अधिकृत नहीं किया था और न हीं उनके पास किसी धर्म का अधिकारक पत्र था, जो कि धर्म महासभा में भाग लेने के लिए आवश्यक था. 


इसलिए विवेकानंद को धर्म महासभा ने अस्वीकार कर दिया था. काफी प्रयास के बाद भी उन्हें कोई सर्टिफिकेट नहीं मिला और निराश होकर वे लौट रहे थे. संयोगवश उनकी मुलाकात हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रो जॉन हेनरी राइट से हुई और वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने वहां के अध्यक्ष को पत्र लिखा- 


‘ये वो व्यक्ति है, जिनका ज्ञान यहां के सारे प्रोफेसरों के सम्मिलित ज्ञान से भी अधिक है.’ प्रो राइट ने कहा कि इस स्वामी से प्रमाण पत्र मांगना सूर्य से उसके चमकने का प्रमाण पत्र मांगने के समान है. उन्होंने ही इस बात पर बल दिया कि वे हिंदूइज्म का महासभा में प्रतिनिधित्व करें. विवेकानंद ने हिंदू धर्म को एक सनातन धर्म के रूप में, जिसमें सभी धार्मिक विचारधाराओं को समाहित करने की क्षमता है, विश्व के सामने प्रस्तुत किया.


पंडित जवाहर लाल नेहरू ने लिखा है कि विवेकानंद की अधिकांश रचनाएं बांग्ला में हैं और कुछ अंग्रेजी में हैं. यथार्थ यह है कि अंग्रेजी में उनकी रचनाएं अधिक हैं, क्योंकि उनके जो भाषण संकलित हो पाये, वे उनके अमेरिका जाने के बाद के ही हैं. चार योग की पुस्तकें तथा अमेरिका, इंग्लैंड और यूरोप में प्रवास के दौरान उनके भाषण अंग्रेजी में ही थे.


कुछ लोग विवेकानंद को जातिवाद के समर्थक और दलित विरोधी साबित करने में लगे हुए है. हकीकत यह है कि उनके चिंतन के दो आयाम हैं- आध्यात्मिक और सामाजिक. आध्यात्मिक स्तर पर वे ‘तत्वमअसि’ को मानते थे और किसी जीव में कोई भेद नहीं मानते थे, क्योंकि सभी ईश्वर के संतान हैं.


 सामाजिक स्तर पर वे ब्राह्मणवाद के घोर आलोचक थे. नवंबर, 1894 में न्यूयॉर्क से अलासिंगा पेरुमल को वह चिट्ठी में लिखते हैं- ‘अन्न! अन्न! मुझे इस बात का विश्वास नहीं है कि वह भगवान जो मुझे यहां पर अन्न नहीं दे सकता, वह स्वर्ग में मुझे अनंत सुख देगा. 


राम कहो! भारत को उठाना होगा, गरीबों को खिलाना होगा, शिक्षा का विस्तार करना होगा और पौरोहित्य की बुराइयों को ऐसा धक्का देना होगा कि वे चकराती हुई एकदम अटलांटिक महासागर में जाकर गिरें.’ यह सत्य है कि समाज से जाति प्रथा को खत्म करना वे उस वक्त अव्यावहारिक मानते थे, परंतु जाति के आधार पर किसी भी प्रकार का प्रिविलेज उन्हें अस्वीकार्य था. उन्होंने दरिद्रनारायण की पूजा और सेवा को सर्वोपरि कार्य माना था. 


साथ ही उन्होंने गरीबों, दलितों को यथास्थिति में रहने पर फटकार भी लगाया और कहा कि उन्हें संस्कृत का ज्ञान अर्जित करना चाहिए और यह समझना चाहिए कि हर व्यक्ति में परमात्मा का वास है, सब में अनंत संभावनाएं छिपी हैं, जिन्हें उसे खुद बाहर लाना है कोई दूसरा नहीं लायेगा. इसलिए उन्होंने आह्वान किया : उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत अर्थात उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत.

(अंग्रेजी विभाग, टीपीएस कॉलेज, पटना)


जीवन परिचय

मूल नाम  नरेंद्रनाथ दत्त

जन्म 12 जनवरी, 1863 को कोलकाता में.

मृत्यु  4 जुलाई, 1902 को रामकृष्ण मठ, बेलुर.

गुरु   रामकृष्ण परमहंस

कर्मक्षेत्र दार्शनिक, धर्म प्रवर्तक और संत.

विषय  साहित्य, दर्शन और इतिहास

विदेश यात्रा अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, रूस और पूर्वी यूरोप में अनेक व्याख्यान.

उपलब्धि वेदांत के संदेश का दुनियाभर में प्रचार.


विवेकानंद के महत्वपूर्ण विचार


हमारी संस्कृति बाकी संस्कृतियों से भिन्न है. बाकी संस्कृतियों का निर्माण दर्जी करते हैं. जबकि हमारी संस्कृति का निर्माण हमारा चरित्र करता है. संस्कृति वस्त्रों में नहीं, चरित्र के विकास में है. 


यह कभी मत कहो कि  ‘मैं नहीं कर सकता’, क्योंकि आप अनंत हैं. आप कुछ भी कर सकते हैं. 


खतरे और मृत्यु के समक्ष मैं स्वयं को चकमक पत्थर के समान सबल महसूस करता हूं, क्योंकि मैंने ईश्वर के चरण स्पर्श किये हैं.


मां, रोटी तो पेट की ज्वाला शांत करनेवाली वस्तु है. इस पेट में न सही, उस पेट में ही सही. देने का आनंद पाने के आनंद से बड़ा होता है.


आप जोखिम लेने से भयभीत न हो, यदि आप जीतते हैं, तो आप नेतृत्व  करते है, और यदि हारते है , तो आप दूसरों का मार्गदर्शन कर सकते हैं.


शक्ति जीवन है तो निर्बलता मृत्यु है. विस्तार जीवन है तो संकुचन मृत्यु है. प्रेम जीवन है तो द्वेष मृत्यु है.


अपने इरादों को मजबूत रखो. लोग जो कहेंगे उन्हें कहने दो. एक दिन वही लोग तुम्हारा गुणगान करेंगे.


अपने आप को विस्तार आपको अपने अंदर से करना होगा. तुम्हें कोई नहीं सिखा सकता, कोई तुम्हें आध्यात्मिक नहीं बना सकता. कोई दूसरा शिक्षक नहीं है, बल्कि आपकी अपनी आत्मा है.


ब्रह्मांड की सभी शक्तियां हमारे अंदर हैं. यह हम ही हैं, जिन्होंने अपनी आंखों के सामने हाथ रखा है और रोते हुए कहा कि अंधेरा है.

कुछ भी ऐसा जो आपको  शारीरिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से कमजोर बनता हो, उसे जहर सामान मान कर नकार देना चाहिए.

पवित्रता, धैर्य और दृढ़ता, यह तीनों सफलता के लिए परम आवश्यक हैं.


बार बार परमेश्वर का नाम लेने से कोई धार्मिक नहीं हो जाता. जो व्यक्ति सत्कर्म करता है, वही धार्मिक है.

सच्चाई के लिए कुछ भी छोड़ देना चाहिए, पर किसी के लिए भी सच्चाई को नहीं छोड़ना चाहिए.



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