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साल दर साल बढ़ता गया है झारखंड में वन क्षेत्र, जाने क्या हुआ फायदा

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झारखंड में वन क्षेत्र हर साल बढ़ता गया है। लेकिन वर्ष 2003 से 2019 के दौरान वन क्षेत्र में सर्वाधिक वृद्धि 2013 में दर्ज हुई। उस वर्ष 496 वर्ग किलोमीटर वन आवरण बढ़ा था। वर्ष 2009 की रिपोर्ट में यह वृद्धि 303 वर्ग किलोमीटर रही। इसके बाद वन आवरण में बढ़ोतरी तो हुई, लेकिन इसमें विकास के कारण वन क्षेत्र के बलिदान का असर भी दिखाई देता रहा। 2005 में तो 125 वर्ग किलोमीटर वन आवरण घट गया। वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के कारण सबसे अधिक वनों की कटाई हुई है। खासकर सड़कों के निर्माण और चौड़ीकरण के कारण पेड़ों का बलिदान अधिक हो रहा है। नहर, सिंचाई परियोजनाओं के अलावा, आवासीय निर्माण भी इसके कारण हैं। राज्य में पिछले दस वर्षों के दौरान 3.20 लाख पेड़ काटे गए और 26.38 करोड़ लगाए गए। प्रतिवर्ष 4.5 वर्ग किलोमीटर हरियाली बढ़ने का औसत है। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की स्टेट फॉरेस्ट रिपोर्ट 2017 की तुलना में 2019 में झारखंड का वन क्षेत्र 58 वर्ग किलोमीटर बढ़ा है। राज्य के भौगोलिक क्षेत्रफल का 29.67 प्रतिशत वन क्षेत्र हो गया है। वृक्षावरण को जोड़ दें तो यह 33.21 प्रतिशत पहुंच जाता है। केंद्र सरकार की ओर से राज्यों को 2022 तक 33 प्रतिशत हरियाली का लक्ष्य दिया गया है। झारखंड ने इसे प्राप्त कर लिया है। राज्य में इस बार मानसून के दौरान करीब 2.20 करोड़ पेड़ लगाए जाएंगे। सरकार ने वन विभाग के इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। वन महोत्सव के साथ पौधारोपण की शुरुआत की जाएगी। वन क्षेत्र, सड़कों के किनारे, नदियों के किनारे पौधारोपण किया जाएगा। पिछले वर्ष 2.5 करोड़ पौधे लगाए गए थे। पौधों का गणित 1. पांच वर्षों में लगे 12 करोड़ पौधे, लागत करीब 800 करोड़ 2. एक वृक्ष लगाने और रखरखाव पर करीब 80 से 85 रुपये खर्च हो रहे 3. झारखंड का वन आवरण (जंगल सहित) 26475 वर्ग किलोमीटर है 4. राष्ट्रीय वन नीति 1988 में हरियाली के लिए 2022 तक निर्धारित लक्ष्य को झारखंड ने पूरा कर लिया है 5. झारखंड का वन और वृक्षावरण राज्य के भौगोलिक क्षेत्रफल का 33.21 प्रतिशत हैं



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