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लिट्टी और सत्तू की बदली पहचान, पहुंचे 5 स्टार होटल, किसान हुए इंटरनेट फ्रेंडली

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लिट्टी और सत्तू की पहुंच जब पांच सितारा होटलों तक हो गई तो गांव के ठेठ किसानों की पहचान भी बदल गई। सिर पर पगड़ी और कंधे पर कुदाल जिनकी पहचान थी वह आज इंटरनेटसेवी हो गया। ब्लॉग के माध्यम से अपनी सफलता की कहानियों को दूसरे तक पहुंचाने लगा तो ह्वाटसअप और दूसरे संचार माध्यम से खेती-किसानी में रोज हो रहे बदलाव से खुद को अपडेट रखने लगा। डेढ़ करोड़ किसान सरकार से ऑनलाइन जुडे हैं। किसानों में हुए इसी बदलाव का नतीजा है कि राज्य सरकार के बिहार कृषि विश्वविद्यालय को डिजिटल इंडिया में स्वर्ण स्कॉच पुरस्कार जीतने का मौका मिला। विश्वविद्यालय ने किसानों और खेती में हुए इसी बदलव से जुड़ी फिल्में अपनी साइट पर डालनी शुरू की तो विदेशी किसान भी इनके मुरीद हो गये। उनकी फिल्में एक करोड़ से ज्यादा बार देखी गई और यूट्यूब ने क्रिएटर अवार्ड से विश्वविद्यालय को नवाजा। पांच साल पहले समस्तीपुर के नयागांव पंचायत के तत्कालीन मुखिया और किसान सुधांशु रंजन और कैमूर के कुदरा निवासी किसान अशोक पांडेय ने खेती किसानी को लेकर ब्लॉग लिखना शुरू किया तो बड़े-बड़े शहरी बाबू दांत से होठ चबाने लगे। अब तो इनकी पहुंच हर गांव तक हो गई है। इंटरनेट के सहारे जानकारी लेकर कई मायने में किसान वैज्ञानिकों और सरकार से भी आगे निकल जा रहे हैं। श्री तकनीक को शुरू में मिली सफलता और बाद में कुछ इलाके तक सिमट जाने की कहानी इसी बदलाव का नतीजा है। राज्य सरकार ने मौसम के अनुकूल खेती योजना शुरू की। इसके पहले ही बेगूसराय, रोहतास, बक्सर और समस्तीपुर सहित कई जिलों के किसानों ने खेती के पैटर्न को बदल दिया। राज्य के गांवों में हुए इस बदलाव का लाभ किसानों को तो मिला ही सरकार की भी कई मुश्किलें दूर हो गईं। किसानों तक सरकार की योजनाएं सीधे पहुंचने लगीं तो योजनाओं में बिचौलियों का हस्तक्षेप भी खत्म हो गया। आज राज्य के एक करोड 51 लाख से ज्यादा किसान न सिर्फ ऑनलाइन आवेदन कर खुद को निबंधित करा चुके हैं, बल्कि हर योजना के लिए ऑनलाइन आवेदन करने में भी आगे रहते हैं।



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